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Showing posts from March, 2021

Poem

 कविता - " शाम " कवियित्री - स्वप्ना बनर्जी दोस्त हो तो दोस्ती निभानी पड़ेगी , हर वादा पूरा करनी पड़ेगी ।। स्वयंवर सजा था , वर माला न था , तु तो था , मगर तेरा साथ न था ।। डुबकी लगाये गोताखोर , हाथ न लगा कुछ , यह तो ऊपर नीचे , एक ही है , सब कुछ ।। चलो साथ बैठकर याद करते हैं । एक - दूसरे पर मरते हैं ।। सौ - सौ वादे कसमें जो तुने खाई , बीते दिनों की यादों को सामने लाई।। जन्मों का रिश्ता है , हमारा , तुझ पर जान जाती है , हमारा ।। साथ देना साथी , याद आना साथी , अब परछाई को भी ले गए साथी ।। रहा क्या मेरे पास ? तुम्हारा नाम ? काया को माया में न बदलो , यह शाम ।।

Poem

 कविता - "खोज" लेखिका - स्वप्ना बनर्जी मन चली उड़ी - उड़ी साजन के संग इधर - उधर नजर पड़ी कहीं - कहीं ।। बनके देखी दुल्हन , करके देखी सत्संग राम - राम का भेष बनाया नकली ।। फिर से फुदक - फुदक मन लेकर चालू खोज सु- संग कौन सही , करती रही देखा - दारी ।। अबकी बार ले लूंगी डुबकी सच्चाई - संग राम - राम पुरा किचड़ बदन में --------।।

Poem

  मुक्तक " झांझर झपट थी बात मेरी अगुआ जो तुम थी आप मेरी " ।।

Pranam2021

 Sabko pranam karti hu is naye prayas me