Poem
कविता - " शाम " कवियित्री - स्वप्ना बनर्जी दोस्त हो तो दोस्ती निभानी पड़ेगी , हर वादा पूरा करनी पड़ेगी ।। स्वयंवर सजा था , वर माला न था , तु तो था , मगर तेरा साथ न था ।। डुबकी लगाये गोताखोर , हाथ न लगा कुछ , यह तो ऊपर नीचे , एक ही है , सब कुछ ।। चलो साथ बैठकर याद करते हैं । एक - दूसरे पर मरते हैं ।। सौ - सौ वादे कसमें जो तुने खाई , बीते दिनों की यादों को सामने लाई।। जन्मों का रिश्ता है , हमारा , तुझ पर जान जाती है , हमारा ।। साथ देना साथी , याद आना साथी , अब परछाई को भी ले गए साथी ।। रहा क्या मेरे पास ? तुम्हारा नाम ? काया को माया में न बदलो , यह शाम ।।